जनजातीय समुदाय में आर्थिक उपार्जन का विष्लेषण

(.. राज्य की मुरिया जनजाति के कृषि कार्य में परिवर्तन के विशेष संदर्भ में

 

डाॅ. ममता रात्रे

समाजशास्त्र एंव समाजकार्य अध्ययनशाला, पं रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ..

*Corresponding Author E-mail:  

 

ABSTRACT:

मुरिया जनजाति एवं आर्थिक उपार्जन की प्रक्रियाएँ-यह शोध कार्य मुरिया जनजाति का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन विषय के अंतर्गत किया गया है इसमें मुरिया जनजाति के विभिन्न आथर््िाक उपार्जन के स्त्रोत एवं वर्तमान में उनमें हो रहे परिवर्तनों को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

 

KEYWORDS: आर्थिक, उपार्जन, स्त्रोत, परिवर्तन, आवागमन साधन.

 


 

INTRODUCTION:

मुरिया जनजाति एंव आर्थिक उपार्जन की प्रक्रियाएॅ -यह शोध कार्य मुरिया जनजाति का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन विषय के अंतर्गत किया गया है इसमें मुरिया जनजाति के विभिन्न आथर््िाक उपार्जन के स्त्रोत एवं वर्तमान में उनमें हो रहे परिवर्तनों को दर्शाने का प्रयास किया गया है

 

व्यवसाय से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का निर्धारण होता है व्यवसाय किसी भी समुदाय का आर्थिक स्त्रोत होता है इसके द्वारा ही परिवार का भरण-पोषण किया जाता है,

 

किसी व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला व्यवसाय उसकी समुदाय में स्थिति का निर्धारण करता है यह निर्धारण उसके व्यवसाय की प्रकृति, महत्व और अन्य व्यवसायों मंे संलग्न व्यक्तियों की तुलना में उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है।

अध्ययनगत् जनजाति का प्रमुख व्यवसाय कृषि है, लेकिन केवल कृषि ही इनका एक मात्र व्यवसाय नहीं है ये अपनी श्रम शक्ति का उपयोग अन्य कार्यो में भी करते है ये कृषि कार्यो के आलावा अन्य के पास कृषि मजदूरी, वनोपज संग्रहण, राहत कार्य, दूसरों की कृषि भूमि अधिया लेकर कृषि करना आदि जैसे कार्यो मंे अपनी श्रम शक्ति का उपयोग करते है जो इनकी आजीविका चलाने में इन्हे सहयोग प्रदान करती है।

 

अध्ययन का समाजशास्त्रीय महत्वः-

मुरिया जनजाति पिछड़ी हुई जनजाति है इसने इसी कारण अनेको मनोवैज्ञानिकों, मानवशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों एवं समाजशास्त्रियों जैसे एल्विन वेरियर, लाला जगदलपुरी, केदारनाथ ठाकुर, रसल एवं हीरालाल शुक्ल जैसे विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया इन्होने सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक इत्यादि जैसे विषयों पर अध्ययन किया एवं इनकी स्थिति पर प्रकाश डाला इस जनजाति में समय के साथ कई परिवर्तन हो रहंे है जो इसके अध्ययन के समाजशास्त्रीय महत्व को दर्शाते है।

शोध अध्ययन के उद्देश्य:

यह शोध अध्ययन मुरिया जनजाति के आर्थिक उपार्जन में हो रहे परिवर्तन को ज्ञात करनें हेतु अध्ययन के निम्न उद्देश्य हैः-

1      मुरिया जनजाति की आर्थिक पृष्ठभूमि का अध्ययन करना।

2      मुरिया जनजाति के आर्थिक उपार्जन में परिवर्तन को ज्ञात करना।

 

अध्ययन पद्धति

प्रस्तुत शोध अध्ययन मुरिया जनजाति के आर्थिक उपार्जन में परिवर्तन का समाजशास्त्रीय अध्ययन पर आधारित है जिसके अन्तर्गत उत्तरदाताओं का चयन हेतु दन्तेवाड़ा जिलें के चार ग्रामों का चयन दैव निदर्शन के लाॅटरी प्रणाली द्वारा चयनित परिवार के मुखिया को अध्ययन इकाई के रूप में चयन किया जिसका विवरण निम्न हैः-

 

उत्तरदाताओं का व्यवसाय

 

उपरोक्त सारणी में उत्तरदाताओं के व्यवसाय सम्बन्धी संकलित तथ्यों से ज्ञात होता है कि सर्वाधिक 33.9 प्रतिषत उत्तरदाताओं द्वारा कृषि कार्य किया जाता है एवं सबसे कम 3.5 प्रतिषत द्वारा शासकीय एंव अर्धशासकीय नौकरी एवं व्यापार किया जाता है। आवागमन साधन से निकट केे ग्राम नेरली में सर्वाधिक 28.5 प्रतिषत कृषि एवं ग्राम भांसी में 36.4 प्रतिषत द्वारा कृषि मजदूरी का कार्य किया जाता है। ग्राम झांसी में 18.2 द्वारा वनोपज संकलन किया जाता है। आवागमन साधन से दूर के ग्राम बड़े बचेली में सर्वाधिक 40.0 एवं ग्राम दुगेली में 34.8 प्रतिषत उत्तरदाताओं द्वारा कृषि कार्य किया जाता है।

 

सोमा हजारा एवं पारथो परेटिन सेनगुप्ता (2012)1 का अध्ययन आदिवासीयों मंे सांस्कृतिक विविधता और झारखण्ड राज्य के सामाजिक, आर्थिक विकास का इन पर प्रभाव पर आधारित रहा इन्होनें झारखण्ड के चार जिलें के 90 परिवार के अपनें अध्ययन में पाया कि 64.3 प्रतिषत उत्तरदाताओं द्वारा दैनिक मजदूरी का कार्य आजीविका का साधन है एवं 16.1 प्रतिषत का व्यवसाय कृषि कार्य है, 6.4 प्रतिषत शासकीय नौकरी एवं 9.8 प्रतिषत गैर शासकीय  नौकरी मे कमानें हेतु अन्य ़क्षेत्रों में पलायन किए हुए है और अन्य संस्कृति से सम्पर्क से इनके जीवन पद्वति, षिक्षा के स्तर, खान-पान, बोलचाल, भाषा शैली पहनावें, स्वास्थ्य की स्थिति एवं साफ-सफाई जैसे विषयों में परिवर्तन एवं सुधार आया है।

 

सिंह (1977)2 ने अपने अध्ययन मंे पाया कि आदिवासी जो कि एक निश्चित अवधि में एक ही व्यवसाय करते है, जहाँ कुछ व्यक्ति एक ही अवधि में थोडे, समय-समय के अंतराल पर अलग-अलग कार्य करते है, जैसे- एक कृषक जिसके पास स्वंय की भूमि कम है, वह पहले अपने खेत मंे कृषक की हैसियत से इसके बाद दूसरों के खेतों में कृषि मजदूर के रूप में सप्ताह के 2-3 दिन कार्य करता है इसके आलावा वह कुली-भूति भी करता है।

 

खान (1983)3 ने बस्तर के गदबा जनजाति के अध्ययन में पाया कि 48.48 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मुख्य व्यवसाय मजदूरी था तथा सहायक व्यवसाय कृषि था।

 

सिंह (1977)4 ने भारत की सात जनजातियों की आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक विष्लेषण किया और अपने अध्ययन मंे पाया कि अधिकतर थारू जनजाति के लोग कृषि की अपेक्षा दैनिक मजदूरी के माध्यम से अपनी जीविका चलाते है।

 

कृषि कार्य में परिवर्तन होनाः

 

उपरोक्त सारणी के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 60.7 प्रतिशत उत्तरदाताओं के कृषि कार्य करनें में परिवर्तन हुआ है एवं 39.3 प्रतिशत में परिवर्तन नहीं होना बतलाया गया है। आवागमन साधन से निकट के ग्रामों में 77.7 एवं आवागमन साधन से दूर के 52.6 प्रतिशत उत्तरदाताओं के कृषि कार्य करनें में परिवर्तन हुआ है।

 

कृषि कार्य मंे परिवर्तन का स्वरूप:

उत्तरदाताओं द्वारा कृषि कार्य करनें में परिवर्तन के स्वरूप संबंधी तथ्यों को ज्ञात करने का प्रयास किया गया एवं उत्तरदाताओं द्वारा संकलित तथ्यों को निम्न सारणी में दर्शानें का प्रयास किया गया है:-

 

कृषि कार्य मंे परिवर्तन का स्वरूपः

 

उपरोक्त सारणी के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि कृषि कार्यो में जुताई के लिए परम्परागत् यंत्रो का 61.8 प्रतिशत द्वारा ट्रैक्टर का उपयोग किया जाता है, 76.5 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा सब्जी का उत्पादन विक्रय के उद्देश्य से किया जाता है। श्रीवास्तव (2006)5 ने जनजातिय संस्कृति के अध्ययन में पाया कि जनजातियों द्वारा महुआ, धान जैसे परम्परागत् उपज ली जाती है जिसके साथ नकदी फसलों के साथ-साथ सब्जी, आलू आदि की उपज भी जी जानें लगी है, 44.1 प्रतिशत सिंचाई के लिए ट्यूबवेल, बोर, कुओं आदि का उपयोग करते है तथा 55.9 प्रतिशत सिंचाई हेतु वर्षा पर निर्भर करते है। 61.8 प्रतिशत उत्तरदाता कीटनाषक का उपयोग करते है एवं 38.2 प्रतिशत द्वारा इनका उपयोग नहीं किया जाता है।

 

बोस(1941)6 ने अपने अध्ययन में पाया कि जनजातियों में जीवन यापन के साधनों में परिवर्तन होने लगा है इनका बाजारों की ओर झुकाव बढा है वे नकदी फसलों का उत्पादन कर निकट के बाजारों मंे बेचने लगे है जिनसें इनके जीवन यापन के स्तर में सुधार हुआ है।

 

निष्कर्ष

मुरिया जनजाति पारंपरिक कृषि उपकरणो का प्रयोग करती है। इनके प्रमुख औजारों में टांगी, कुल्हाड़ी, तीर धनुष और लाठी है इनके अलावा वे हल बैल का प्रयोग भी करते है। कृषि कार्य में पुरूष, महिला एवं परिवार के सभी सदस्यो का सहयोग लिया जाता है। यह जनजाति वर्तमान में आधुनिक कृषि उपकरणों का प्रयोग जैसे ट्रैक्टर का प्रयोग भी करने लगे है लेकिन यह इनकी अशिक्षा एवं अंधविश्वास जैसी कमियों के कारण ये कम जनसंख्या द्वारा ही उपयोग में लाए जाते है जिनका प्रभाव इनकी उत्पादक क्षमता पर पड़ता है। इनके द्वारा वर्तमान में सब्जी का उत्पादन निकटवर्ती बाजारों में विक्रय के लिए भी किया जाने लगा है साथ ही सिचाई के साधनों के साथ कीटनाषक एवं रसायनियक खाद का प्रयोग भी किया जाने लगा है

 

REFERENCE:

1.     Soma Hazra and Partho pratin Sangupta (2012): Cultural diversity and its impact   on Jharkhand’s socio-economic development, AJMR, vol-1 Issue 3, August 2012, p.  74-86

2.       ंिसंह (1977): ”कम्परेटिव स्टडी आॅफ सेवन द्राइबल आॅफ इण्डिया इकानोमिक्स   डाइमेन्शन द्राइबल वाल्यूम 13 नं. 1 पृ. 58

3.       खान मोहम्मद युसुफ (1983)गदबा जनजातिवन्यजाति जनवरी, पृ. 18

4.       ंिसंह (1977): ”कम्परेटिव स्टडी आॅफ सेवन द्राइबल आॅफ इण्डिया इकानोमिक्स डाइमेन्शन द्राइबल वाल्यूम 30 नं. 1 पृ. 14-19

5.       श्रीवास्तव . आर. एन. (2006): ”जनजातिय संस्कृतिशताक्षी प्रकाशन पृ. 68Bose, N. K. (1941) “Hindu method of Tribal Absorption” Science and Culture, 7: p. 188-194

 

 

Received on 19.03.2021         Modified on 23.03.2021

Accepted on 26.03.2021         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(1):55-58.